मेहनत को फल
एक गाँओं में एक किसान रहत थो।
बाके तीन मोड़ा हते, तीनई भोत अलाल थे।
भओ का थो, छुटपन मेईं
मोड़ों की मेहतारी मर गई थी।
जासे किसान उनसे भोत प्रेम करत थो।
बाने मोड़ों हे खूब आराम दओ थो जासे
मोड़ा हुन अलाल हो गए थे।
बिनको छुटपन तो जेंसे-तेंसे कट गओ, पर जब बे बड़े हो गए तो किसान हे फिकर
होन लगी की मेरे मरबे के बाद कैसे इनको जीबन चलहे ?
इनने खेती बाड़ी करबो सीखी नईहे।
जेई रंग-ढंग रहे
तो जे बरबाद हो जेहें।
किसान सोचन लगो मोड़ों हे केंसे सही गेल पे लाऊँ ?
का उपाय करूँ जासे जे मोड़ा सुधर
जाएँ ? बाके दिमाक में एक उपाओ आओ।
एक दिना भुनसारे किसान गेरहोंस होके धरती पे गिर गओ ओर तड़फड़ान लगो।
तीनई मोड़ा घबराके दोड़े।
बिनने पिताजी हे बिछोना पे लिटाओ ओर पूछी, “का हो गओ पिताजी ?”
पिताजी बोले, “मेरी छाती में भोत कयके
दरद हो रओ है, लगत है अब में नईं बचूँ।
बस तुमरी फिकर में मेरी जान अटकी हे।
अदि तुम लोग खेती बाड़ी
करके कछू कमा-धमा रए होते तो में सुख से मर तो सकत थो।
न तुमने मेहनत करबो सीखी न तुम धेला कमा
सको।” तीनई मोड़ा रोत-रोत बोले, “पेले तुम ठीक हो जाओ पिताजी हम मेहनत करबे तड़यार हैं।'
किसान बोलो, “मोहे अपने दादा की एक बात याद आ रई हे।
बिनने मरत समय मेरे कान में कई थी। बिनने
कई थी, “अपने जामुन बारे खेत में तीन हण्डा गड़े हैं, बिनमें भोत धन-सम्पत्ति हे।
तुम लोग अदि खेत खोदके बे
हण्डा निकार लो, वो तुम्हें जीबन भर मेहनत मजूरी करबे की जरूरत नई पड़हे।”
मोड़ों ने पूछी। “पिताजी बे
हण्डा खेत में से केसे निकारें ?”
किसान बोलो, “तुम लोग कल उठ भुनसारे कुदाली लेके खेत में जझ़ओ ओर
सबरों खेत खोदियो। काहे से हण्डा काँ गड़े हें जा मोहे नई मालुम |”
दूसरे दिना उठ भुनसारे तीनई भाई, कुदाली लेके जामुन बारे खेत में गए।
दिन भर बिनने खेत खोदो, एक
बित्ता धरती नईं छोड़ी । पूरो खेत खोद डारो लेकिन हण्डा नई निकरे।
दिन डूबे हारे-थके घर लोटे। बिनने पिताजी से
कई, “हमने पूरो खेत खोद डारो, लेकिन हण्डा नईं निकरे।”
पिताजी बोले, “लगत हे हण्डा जमीन में गहरे गड़े
हैं ? ऐंसो करियो कल तुम लोग बक्खर ले जइयो, पूरे खेत बखरियो।
हो सकत हे बक्खर में उरझके हण्डा जमीन
के ऊपर आ जहें।
” पिताजी ने जेंसी कई थी मोड़ों ने बेंसई करो - खेत हे बखरो, पर बिन्हें हण्डा नईं मिले।
निगल घर लोटे।
पिताजी ने बिनसे कई, “कोई बात नई बेटाहरों, इत्ती मेहनत करी हे तो तुम लोगों हे हण्डा जरूर मिलहें।
ऐंसो करियो खेत में हल ले जइयो, हल जमीन में गहरो जाहे।
बा में उरझके हण्डा ऊपर आ जाहें।
अब इत्ती मेहनत
करहो तो एक काम ओर करियो, बई में चना की बोनी कर दइओ।
” मोड़ों ने ऐंसई करो लेकिन बिन्हें हण्डा नई
मिले। बिनने पिताजी से कई।
पिता ने बिनकी आस बधाई, कई, “तुम लोग चिंता-फिकर मत करो।
हो सकत हे
जब फसल कट हे, तब हण्डा निकर आएँ खेत में से।”
बिनके खेत में चना की खूब फसल भई ।
पिठाजी ने मोड़ों हे मण्डी में भेजके चना बिकबा दए।
मोड़ाहुन खूब
सारे रुपया-पईसा लेके मण्डी से लोटे।
किसान ने बे पईसा तीन हण्डो में भर दए ओर मोड़ों से कई, “जे रहे तुमरे
घन-दोलत से भरे हण्डा।
का अभहे भी तुम्हें खेत में गड़े हण्डों की जरूरत लग रई है ?”
तीनई मोड़ा बोले, “हम
समझ गए हैं पिताजी, अदि हम खेती में मेहनत करहें तो हट साल धन-दोलत से भरे ऐंसे कई हण्डा कमा लेहें।'